Tukdoji Maharaj Yanchi Mahiti Marathi Madhe

Tukdoji Maharaj

Tukdoji Maharaj (1909 – 1968)

भारत से एक आध्यात्मिक सन्त थे। वह पूर्णरूप से आध्यात्मिक जीवन में लीन थे। जिन्हें राष्ट्रसंत का सम्मान मिला। उनका पूरा जीवन जाति, वर्ग, पंथ या धर्म से परे समाज की सेवा के लिए समर्पित था उनका नाम है tukdoji maharaj.

Tukdoji Maharaj Information

पूरा नाम (Name): माणिक बान्डोजी इंगळे (Tukdoji Maharaj)
जन्मतिथि (Birthday): 30 अप्रैल 1909, अमरावती
मृत्यु (Death): 11 अक्टूबर 1968
राष्ट्रीयता (Nationality): भारतीय
पुरस्कार – उपाधि (Awards): राष्ट्रसंत
कार्य (work): ग्रामगेता, गीता प्रसाद

तुकडोजी महाराज का मूल नाम माणिक बान्डोजी इंगळे था उनका जन्म 1909 में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में यावली गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन का अधिकांश समय रामटेक, सालबर्डी, रामदिघी और गोंदोडाके बीहड़ जंगलों में बिताया था। वह आडकोजी महाराज के शिष्य थे।

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तुकडोजी महाराज, महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण सहित सामाजिक सुधारों में शामिल थे। उन्होंने “ग्रामगीता” लिखी है जो गांव के विकास के लिए साधनों का वर्णन करती है। उनके द्वारा शुरू किए गए कई विकास कार्यक्रम आज भी कुशलता से काम करना जारी हैं।

भारत के डाक विभाग ने उनके नाम पर एक स्मारक टिकट जारी करके तुकडोजी महाराज को सम्मानित किया था।

संत तुकाडोजी महाराज का कार्य – Work of Saint Tukdoji Maharaj

1941 में उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह किया और उन्होंने ‘छोड़ो भारत’ आंदोलन के बड़े पैमाने पर उदय में भाग लिया। उन्होंने ब्रिटिश शासकों द्वारा उस समय अपनाने वाले अमानवीय दमनकारी उपायों का जोरदार विरोध किया। इसी वजह से 1942 में गिरफ्तार किया गया था और उन्हें नागपुर और रायपुर केंद्रीय जेलों में कैद किया गया था।

Tukdoji Maharaj Yanchi Mahiti

उन्होंने नागपुरसे 120 किमी दूर मोझरी नामक गाँव में गुरूकुंज आश्रम की स्थापना की, जहाँ उनके अनुयायियोंकी सक्रिय सहभागितासे संरचनात्मक कार्यक्रमोंको चलाया जाता था। आश्रमके प्रवेश द्वारपर ही उनके सिद्धांत इस प्रकार अंकित हैं इस मन्दिरका द्वार सबके लिए खुला है, हर धर्म और पंथके व्यक्तिका यहाँ स्वागत है, देश और विदेशके हर व्यक्तिका यहाँ स्वागत है।

स्वतंत्रता की शुरुआत के बाद, संत तुकाडोजी ने ग्रामीण पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने ‘अखिल भारत श्री गुरुदेव सेवा मंडल’ की स्थापना की और एकीकृत ग्रामीण विकास के लिए कई कार्यक्रम विकसित किए। उनकी गतिविधियों इतनी प्रभावशाली थी कि, उस समय भारत के राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें ‘राष्ट्रसंत’ का सम्मानित किया।

तुकडोजी महाराज विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक उपाध्यक्ष थे

उन्होंने राष्ट्रीय कारणों के लिए कई मोर्चों पर काम किया जैसे बंगाल अकाल (1945), चीन युद्ध (1962) के समय, और पाकिस्तान (1965) के आक्रमकता, कोयना भूकंप का तबाही (1962) राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज प्रभावित और व्यवस्थित रचनात्मक राहत कार्यों की सहायता के लिए इस मिशन पर गए।

उन्होने आचार्य भावे के भूदान आंदोलन में भी भाग लिया। और साथ ही में 1955 में जापान में धर्म और विश्व शांति के विश्व सम्मेलन में भाग लिया । इस यात्रा पर उन्होंने एक मेरियन जापान यात्रा पुस्तक लिखी।

तुकाडोजी महाराज एक पारंपरिक प्रार्थना संगठन को रचनात्मक, सामाजिक रचनाओं में सशक्त युवा पुरुषों और महिलाओं के अनुशासित, व्यापक आधार समूहों में बदल दिया।

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अंतिम दिनों में तुकडोजी महाराज को घटक बीमारी कन्सर ने जकड लिया था हर संभव प्रयास कर के भी उस बीमारी से छुटकारा नहीं पाया गया और तुकडोजी महाराज ने अपने नश्वर शरीर को 11 अक्टूबर 1968 को छोड़ दिया। राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज की जयंती हर साल 30 अप्रैल को मनाते है।

हम सब दिल से मिट्टी के इस बेटे को श्रद्धांजलि देते हैं जो समाज में परिवर्तन लाने के लिए भक्ति और क्रिया को जोड़ती है।

Below All Speech Is marathi language

तुकडोजी महाराज यांच्या आयुष्यातील महत्वाच्या तिथी

३० एप्रिल १९०९: अमरावती जिल्ह्यातील यावली शहीद येथे जन्म.
– १५ जानेवारी १९२५ : गृहत्याग करून तपोसाधनेसाठी रामटेकच्या अभयारण्यात निघाले. सात महिने श्रीराम मंदिर, नारायण टेकडी, कपूरबावडी परिसरात योगसाधना.
-१९२६ : सहा महिने रामदिघी, सात बहिणी पहाड आणि ताडोब्याच्या वनात वास्तव्य केले.
-१९२९ : ‘श्रीतुकड्यादासकृत भजनावली’ प्रकाशित. सध्या ‘स्वानंदामृत भजनावली’ असे नाव आहे.

-१९३५ : सालबर्डीच्या यज्ञात दहा लाख लोकांची उपस्थिती
-४ एप्रिल १९३५ : मोझरी धर्मसेवा आश्रमाचे भूमिपूजन
-३१ मार्च १९३६ : महात्मा गांधी यांनी राष्ट्रसंतांना सेवाग्रामला बोलविले.
– ५ मे १९३६ : पवनार आश्रमात आचार्य विनोबा भावे यांनी महाराजांना संमेलनात सहभागी होण्यासाठी आमंत्रण दिले.
– १९३८ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाच्या रामटेक येथील कार्यक्रमात गोळवलकर गुरुजींची भेट
– १९४० : अकोल्याच्या शीख धर्म परिषदेत सहभाग
– गावागावांत आरती मंडळ स्थापन करून लोकजागृती
-आदिवासींना जीवन जगण्याचा पाठ दिला.

– १९४१ : वरखेडला श्री गुरुदेव चरखा संघ स्थापन
– २५ सप्टेंबर १९४२ : बेलापूर साखर कारखान्यातील भजनानंतर महाराजांना ‘क्रांतिवीर तुकडोजी’ अशी ओळख.
-१९४२ : मोझरीत राष्ट्रधर्म शिक्षण वर्गात मर्दानी व मैदानी व्यायामाचे शिक्षण.
– ‘अब काहे को धुम मचाते हो’ या भजनावरून राष्ट्रसंतांना अटक करून नागपूर, रायपूरच्या तुरुंगात टाकण्यात आले होते.
-१९४३ : श्री गुरुदेव मासिक सुरू
– १९४४ : अनेक गावांमध्ये महिला मंडळ आणि राष्ट्रसेविका समितीची स्थापना.
– ११ नोव्हे. १९४७ : रामटेकचे मंदिर हरिजनांसाठी खुले
– १९४९ : आमगावात सामूदायिक शेतीचा यशस्वी प्रयोग राबविला
-१९५३ : १५व्या विदर्भ साहित्य संघाचे उद्‌घाटक व आयोजकपदाचा मान
– ग्रामगीता लेखनाची प्रेरणा राष्ट्रसंतांना २२ जुलै १९५३ पंढरपूर येथील चंद्रभागेच्या तीरी मिळाली.
-संत गाडगे महाराज यांच्यासोबत २८ भेटी.
– ६ जुलै १९६८ : पंढरपूर येथील हनुमान मंदिर मैदानात आषाढी एकादशीला अखेरचे भजन
११ ऑक्टोबर १९६८ : गुरुकुंजात सायंकाळी ४ वाजून ५८ मिनिटांनी महानिर्वाण..tukdoji maharaj

राष्ट्रसंतांची साहित्य संपदा

मराठीतील….
भजने : ११६०
अभंग : २१०९
श्लोक : ६७६
ओव्या : ५१४९
पोवाडे : १०
मंगलाष्टके : ११

हिंदीतील…
भजने : २३६९
बरखा : १७४६
सद्‌विचार : १५१७
प्रार्थनाष्टक : ०८
मंगलाष्टके : ०५
(याशिवाय आरत्या, स्वागत गीत, सुविचार, श्रीगुरुदेव महिमामृत, मराठी-हिंदी भाषणे, लेखही त्यांनी लिहिले)

या भारतात बंधुभाव, नित्य वसू दे!
प्रभू वरद असा दे!!
हे सर्व पंथ संप्रदाय एक दिसूं दे!
मतभेद नसूं दे!!धृ!!

गाव हा विश्वाचा नकाशा!
गावावरून देशाची परीक्षा!
गावचि भंगता अवदशा!
येईल देशा!!

व्यायामहिन मनुष्य हा स्वत:चा व राष्ट्राचाही शत्रू होय!
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज

‘हा काँग्रेसचा सभासद आहे. तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा स्वयंसेवक आहे, तो आरती मंडळाचा सेवक आहे असा भेदाभेद करीत बसू नका तर राष्ट्रकार्यात एकजुटीने पुढे या’
-राष्ट्रसंत